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वन पर्व
अध्याय ५४
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वृहदश्व उवाच
यमस्त्वन्नरसं प्रादाद्धर्मे च परमां स्थितिम् |  ३१   क
अपाम्पतिरपां भावं यत्र वाञ्छति नैषधः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति