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वन पर्व
अध्याय ५४
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वृहदश्व उवाच
स्रजं चोत्तमगन्धाढ्यां सर्वे च मिथुनं ददुः |  ३२   क
वरानेवं प्रदाय़ास्य देवास्ते त्रिदिवं गताः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति