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वन पर्व
अध्याय ५४
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वृहदश्व उवाच
पुनश्च रमणीय़ेषु वनेषूपवनेषु च |  ३७   क
दमय़न्त्या सह नलो विजहारामरोपमः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति