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वन पर्व
अध्याय ५४
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वृहदश्व उवाच
सुकेशान्तानि चारूणि सुनासानि शुभानि च |  ७   क
मुखानि राज्ञां शोभन्ते नक्षत्राणि यथा दिवि ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति