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उद्योग पर्व
अध्याय १५०
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वैशम्पाय़न उवाच
उष्णीषाणि निय़च्छन्तः पुण्डरीकनिभैः करैः |  २०   क
अन्तरीय़ोत्तरीय़ाणि भूषणानि च सर्वशः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति