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विराट पर्व
अध्याय ५४
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वैशम्पाय़न उवाच
स रोषवशमापन्नः कर्णमेव जिघांसय़ा |  १७   क
अवैक्षत विवृत्ताभ्यां नेत्राभ्यां कुरुपुङ्गवः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति