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विराट पर्व
अध्याय ५४
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वैशम्पाय़न उवाच
उत्सृज्य च महावाहुर्द्रोणपुत्रं धनञ्जय़ः |  १९   क
अभिदुद्राव सहसा कर्णमेव सपत्नजित् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति