विराट पर्व  अध्याय ५४

वैशम्पाय़न उवाच

तय़ोर्देवासुरसमः संनिपातो महानभूत् |  २   क
किरतोः शरजालानि वृत्रवासवय़ोरिव ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति