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विराट पर्व
अध्याय ५४
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वैशम्पाय़न उवाच
न स्म सूर्यस्तदा भाति न च वाति समीरणः |  ३   क
शरगाढे कृते व्योम्नि छाय़ाभूते समन्ततः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति