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विराट पर्व
अध्याय ५४
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वैशम्पाय़न उवाच
हय़ानस्यार्जुनः सर्वान्कृतवानल्पजीवितान् |  ५   क
स राजन्न प्रजानाति दिशं काञ्चन मोहितः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति