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उद्योग पर्व
अध्याय ५४
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दुर्योधन उवाच
अभिद्रुग्धाः परे चेन्नो न भेतव्यं परन्तप |  १८   क
असमर्थाः परे जेतुमस्मान्युधि जनेश्वर ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति