सौप्तिक पर्व  अध्याय ८

सञ्जय़ उवाच

पश्चादङ्गुलय़ो रूक्षा विरूपा भैरवस्वनाः |  १२९   क
घटजानवोऽतिह्रस्वाश्च नीलकण्ठा विभीषणाः ||  १२९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति