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मौसल पर्व
अध्याय ४
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वैशम्पाय़न उवाच
तृणं च मुसलीभूतमपि तत्र व्यदृश्यत |  ३८   क
व्रह्मदण्डकृतं सर्वमिति तद्विद्धि पार्थिव ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति