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उद्योग पर्व
अध्याय ५४
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दुर्योधन उवाच
पितामहो हि गाङ्गेय़ः शन्तनोरधि भारत |  ४६   क
व्रह्मर्षिसदृशो जज्ञे देवैरपि दुरुत्सहः |  ४६   ख
पित्रा ह्युक्तः प्रसन्नेन नाकामस्त्वं मरिष्यसि ||  ४६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति