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उद्योग पर्व
अध्याय ५४
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दुर्योधन उवाच
कृपश्चाचार्यमुख्योऽय़ं महर्षेर्गौतमादपि |  ४८   क
शरस्तम्वोद्भवः श्रीमानवध्य इति मे मतिः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति