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उद्योग पर्व
अध्याय ५४
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दुर्योधन उवाच
तस्य शक्त्योपगूढस्य कस्माज्जीवेद्धनञ्जय़ः |  ५३   क
विजय़ो मे ध्रुवं राजन्फलं पाणाविवाहितम् |  ५३   ख
अभिव्यक्तः परेषां च कृत्स्नो भुवि पराजय़ः ||  ५३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति