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वन पर्व
अध्याय २१८
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मार्कण्डेय़ उवाच
शतक्रतुश्चाभिषिच्य स्कन्दं सेनापतिं तदा |  ४२   क
सस्मार तां देवसेनां या सा तेन विमोक्षिता ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति