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भीष्म पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
तं विसञ्ज्ञमथो ज्ञात्वा त्वरमाणोऽस्य सारथिः |  १७   क
अपोवाह रणाद्राजंस्ततः सैन्यमभिद्यत ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति