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भीष्म पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
न पाण्डवाः प्रतिवलास्तव राजन्कथञ्चन |  ३४   क
तथा द्रोणस्य सङ्ग्रामे द्रौणेश्चैव कृपस्य च ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति