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द्रोण पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
जित्वा सुवहुशः शत्रून्प्रेषय़ित्वा च मृत्यवे |  १५   क
गतः पुण्यकृतां लोकान्सर्वकामदुहोऽक्षय़ान् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति