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शल्य पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
तेषु राजसहस्रेषु तावकेषु महात्मसु |  १५   क
एको दुर्योधनो राजन्नदृश्यत भृशं क्षतः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति