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द्रोण पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
आश्वासय़ स्नुषां राज्ञि मा शुचः क्षत्रिय़े भृषम् |  २४   क
श्वः प्रिय़ं सुमहच्छ्रुत्वा विशोका भव नन्दिनि ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति