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द्रोण पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
शुष्काशन्यश्च निष्पेतुः सनिर्घाताः सविद्युतः |  ४   क
चचाल चापि पृथिवी सशैलवनकानना ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति