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कर्ण पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
एतद्दुःखं सारथे धर्मराजो; यन्मां हित्वा यातवाञ्शत्रुमध्ये |  १२   क
नैनं जीवन्नापि जानाम्यजीव; न्वीभत्सुं वा तन्ममाद्यातिदुःखम् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति