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कर्ण पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
सञ्चोदितो भीमसेनेन चैवं; स सारथिः पुत्रवलं त्वदीय़म् |  २   क
प्राय़ात्ततः सारथिरुग्रवेगो; यतो भीमस्तद्वलं गन्तुमैच्छत् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति