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कर्ण पर्व
अध्याय ५४
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विशोक उवाच
सर्वे कामाः पाण्डव ते समृद्धाः; कपिध्वजो दृश्यते हस्तिसैन्ये |  २५   क
नीलाद्धनाद्विद्युतमुच्चरन्तीं; तथापश्यं विस्फुरद्वै धनुस्तत् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति