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कर्ण पर्व
अध्याय ५४
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विशोक उवाच
कपिर्ह्यसौ वीक्ष्यते सर्वतो वै; ध्वजाग्रमारुह्य धनञ्जय़स्य |  २६   क
दिवाकराभो मणिरेष दिव्यो; विभ्राजते चैव किरीटसंस्थः ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति