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कर्ण पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
ततो राजन्नागरथाश्वय़ूनां; भीमाहतानां तव राजमध्ये |  ५   क
घोरो निनादः प्रवभौ नरेन्द्र; वज्राहतानामिव पर्वतानाम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति