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शल्य पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
दक्षिणेन सरस्वत्याः स्वय़नं तीर्थमुत्तमम् |  १३   क
तस्मिन्देशे त्वनिरिणे तत्र युद्धमरोचय़न् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति