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शल्य पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
ततो भीमो महाकोटिं गदां गृह्याथ वर्मभृत् |  १४   क
विभ्रद्रूपं महाराज सदृशं हि गरुत्मतः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति