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शल्य पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
अववद्धशिरस्त्राणः सङ्ख्ये काञ्चनवर्मभृत् |  १५   क
रराज राजन्पुत्रस्ते काञ्चनः शैलराडिव ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति