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शल्य पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
वर्मभ्यां संवृतौ वीरौ भीमदुर्योधनावुभौ |  १६   क
संय़ुगे च प्रकाशेते संरव्धाविव कुञ्जरौ ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति