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शल्य पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
रणमण्डलमध्यस्थौ भ्रातरौ तौ नरर्षभौ |  १७   क
अशोभेतां महाराज चन्द्रसूर्याविवोदितौ ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति