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द्रोण पर्व
अध्याय १०
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धृतराष्ट्र उवाच
मनसापि हि दुर्धर्षौ सेनामेतां यशस्विनौ |  ४२   क
नाशय़ेतामिहेच्छन्तौ मानुषत्वात्तु नेच्छतः ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति