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शल्य पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
प्रजासंहरणे क्षुव्धौ समुद्राविव दुस्तरौ |  ३१   क
लोहिताङ्गाविव क्रुद्धौ प्रतपन्तौ महारथौ ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति