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शल्य पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
ततो दुर्योधनो राजन्निदमाह युधिष्ठिरम् |  ३८   क
सृञ्जय़ैः सह तिष्ठन्तं तपन्तमिव भास्करम् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति