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शल्य पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा लाङ्गलिनं राजा प्रत्युत्थाय़ च भारत |  ४   क
प्रीत्या परमय़ा युक्तो युधिष्ठिरमथाव्रवीत् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति