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शल्य पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
ततः समुपविष्टं तत्सुमहद्राजमण्डलम् |  ४०   क
विराजमानं ददृशे दिवीवादित्यमण्डलम् ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति