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शल्य पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
शुशुभे राजमध्यस्थो नीलवासाः सितप्रभः |  ४२   क
नक्षत्रैरिव सम्पूर्णो वृतो निशि निशाकरः ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति