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शल्य पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
समन्तपञ्चकं क्षिप्रमितो याम विशां पते |  ५   क
प्रथितोत्तरवेदी सा देवलोके प्रजापतेः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति