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आदि पर्व
अध्याय ५५
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वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्गस्थो जीवलोकस्य यथा शक्रः सुखावहः |  १४   क
पाण्डवानां तथा नित्यं विदुरोऽपि सुखावहः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति