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आदि पर्व
अध्याय ५५
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो निमित्ते कस्मिंश्चिद्धर्मराजो युधिष्ठिरः |  ३१   क
वनं प्रस्थापय़ामास भ्रातरं वै धनञ्जय़म् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति