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शान्ति पर्व
अध्याय ५५
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वासुदेव उवाच
पूज्यान्मान्यांश्च भक्तांश्च गुरून्सम्वन्धिवान्धवान् |  १३   क
अर्घ्यार्हानिषुभिर्हत्वा भवन्तं नोपसर्पति ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति