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शल्य पर्व
अध्याय ३६
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वैशम्पाय़न उवाच
यक्षा विद्याधराश्चैव राक्षसाश्चामितौजसः |  २१   क
पिशाचाश्चामितवला यत्र सिद्धाः सहस्रशः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति