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अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
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च्यवन उवाच
वरश्च गृह्यतां मत्तो यश्च ते संशय़ो हृदि |  १   क
तं च व्रूहि नरश्रेष्ठ सर्वं सम्पादय़ामि ते ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति