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अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
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च्यवन उवाच
अन्तर्हितश्चास्मि पुनः पुनरेव च ते गृहे |  १८   क
योगमास्थाय़ संविष्टो दिवसानेकविंशतिम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति