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अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
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च्यवन उवाच
अविशङ्को नरपते प्रीतोऽहं चापि तेन ते |  २३   क
धनोत्सर्गेऽपि च कृते न त्वां क्रोधः प्रधर्षय़त् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति