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अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
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च्यवन उवाच
ततः प्रीतेन ते राजन्पुनरेतत्कृतं तव |  २४   क
सभार्यस्य वनं भूय़स्तद्विद्धि मनुजाधिप ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति