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अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
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च्यवन उवाच
व्राह्मण्यं काङ्क्षसे हि त्वं तपश्च पृथिवीपते |  २८   क
अवमन्य नरेन्द्रत्वं देवेन्द्रत्वं च पार्थिव ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति