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अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
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कुशिक उवाच
पुनश्चाख्यातुमिच्छामि भगवन्विस्तरेण वै |  ३५   क
कथमेष्यति विप्रत्वं कुलं मे भृगुनन्दन |  ३५   ख
कश्चासौ भविता वन्धुर्मम कश्चापि संमतः ||  ३५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति